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पतन की और उन्मुख आस्तित्व
Post Date :06-Jan-2010
Article Post By : KK: IBP-President ................
देश की आजादी को ६२ साल हो गए, हमने क्या पाया.... और क्या खोया.......... कृषि प्रधान देश जहा आज भी लाखो भूखे नंगे बच्चे भूखे सो जाते है और जिसका गेहू एक्सपोर्ट कर हम प्रगतिशील देशो की दोड़ मैं आगे बढ़ते है..... कैसे??? गेहू बेचकर विदेशी मुद्रा देश मैं लाकर..... और दूसरी और भ्रष्टाचार की काली पूंजी विदेशी बैंकों मैं जमा होती है......................"Nill By Nill"
फिर भी हमे गर्व है................. कृषि प्रधान देश जहा भी भूमि आज भुमाफियाओ के हाथो सहरीकरण की और बढ़ रही है ...........
....... कहने का तात्पर्य........... हम पीछे जा रहे है या आगे...................??????
चिंतनीय विषय है यह............ की आस्तित्व कुछ ही दिन का है............. फिर मानव का भोजन मानव ही बनेगा ............. ५ रूपये मैं बच्चा और १० रुपये मैं औरत बिकेगी........... आज हम IT Technique पर गर्वित हो रहे है........ परंपरागत उद्दमों को छोड़ कर Developer बन रहे है ...... सामाजिकता खोते जा रहे है ..... और गर्वित महसूस कर रहे है अपने आप को IT Person कहकर .....
चंद client नामक अंग्रेजो के उंगलियों के इशारे पर चलकर......
समाज का विकास सर्वोपरि है............................... कुछ ऐसा करे जिससे समाज का उद्धार हो सके .......
क्यों की देश तो वैसे भी पतन की और उन्मुख है ... और वो होकर रहेगा इसी तरह चलता रहा तो .................
"बादलों के दरमियाँ कुछ साजिस हुई ,
मेरा घर मिटटी का था मेरे ही घर बारिश हुई
उनकी भी जिद है बिजलियाँ गिराने की मेरी
भी जिद है वही आशिया बनाने की "